चुनावों को कौन कर रहा है महंगा?

अमेरिका के चुनावों के खर्च की खबर पढ़कर मुझे चक्कर सा आ रहा है। मैं ये नहीं समझ पा रहा हूँ कि दुनिया में कौन लोग हैं जो चुनावों को लगातार महंगा करते चले जा रहे हैं। लगता है की इस मामले में हमारी होड़ भी अमेरिका से ही है। भारत में पहला आम चुनाव केवल दस-ग्यारह करोड़ रुपये में हो गया था लेकिन पिछ्ले आमचुनाव में 50 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए थे। खबर है कि अमेरिका में इस बार के चुनाव में 14 अरब डालर खर्च हो सकते हैं।

दुनिया भर में लोकतंत्र को लगातार महंगा करने के पीछे कोई है या ये सब अपने आप हो रहा है? सवाल ये भी है कि भारत में जहाँ देश की 60 फीसदी आबादी रोजाना तीन डॉलर से कम की आमदनी में अपना गुजारा करती है, वहां आम चुनाव में प्रति वोटर आठ डॉलर खर्च हो रहा है तो क्यों हो रहा है। अमेरिका की बात और है, लेकिन गौर करने काबिल मुद्दा भारत का है। अमेरिका तो ये खर्च बर्दाश्त भी कर लेगा, पर हमारा क्या होगा?

अनुमान और आंकड़े बताते हैं कि भारत में 2014 में सबसे मंहगा चुनाव भाजपा ने लड़ा था। उस आम चुनाव में केंचुआ (केंद्रीय चुनाव आयोग) के पांच हजार करोड़ को मिला लें तो भाजपा और कांग्रेस ने 30 हजार करोड़ रुपये खर्च किये थे। आखिर ये रुपया आया कहाँ से था? चुनाव जीतने के बाद किसी ने ये सवाल नहीं उठाया कि चुनावों में पानी की तरह बहाया गया पैसा किसका था और कहाँ से आया था? 2019 के चुनाव में ये खर्च बढ़कर पचास हजार करोड़ रुपये हो गया। अमेरिका में भी 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में इतना पैसा खर्च नहीं हुआ था। जाहिर है कि ये सब सफेद पैसा यानी मेहनत का पैसा तो नहीं था, इसमें ईमानदारी नहीं थी।

राजनीतिक दल दावा करते हैं कि उनके पास पैसा सदस्‍यता और दान से आता है, आता भी होगा, लेकिन अमेरिका की तरह ये दान और सदस्‍यता नंबर एक की नहीं होती। अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बाइडेन अमेरिकी इतिहास के पहले प्रत्याशी होंगे जिन्होंने दानकर्ताओं से एक अरब डॉलर की राशि प्राप्त की। उनके प्रचार अभियान को 14 अक्टूबर को 93.8 करोड़ डॉलर प्राप्त हुए हैं, जिससे डेमोक्रेट द्वारा रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप को हराने को लेकर उत्सुकता बढ़ती जा रही है। वहीं, ट्रंप ने दानकर्ताओं से 59.6 करोड़ डॉलर का कोष चुनाव प्रचार के लिए जुटाया है। एक शोध समूह ने कहा कि महामारी के बावजूद हर कोई वर्ष 2020 के चुनाव में अधिक राशि दान कर रहा है, फिर चाहे वह आम लोग हों या अरबपति। इस बार महिलाओं ने दान देने का रिकॉर्ड तोड़ दिया है।

सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़ के चेयरमैन एन. भास्कर राव के अनुसार, भारत में मुश्किल यही है कि अभी भी वोट फॉर नोट का चलन है, यानी मतदाताओं को पैसा पहुंचाना या फिर उनके लिए जरूरत की चीज़ें मुहैया करवाना आम बात है। ख़ास बात ये है कि इसमें काले धन का प्रयोग अभी भी प्रचलन में है। सबसे बड़ा ख़र्च मीडिया के हिस्से का है। जानकारों के अनुसार 2014 के आम चुनावों में पार्टियों ने टेलीविज़न चैनलों, अख़बारों और रेडियो स्टेशनों में अपने प्रचार के लिए जितना ख़र्च किया है वो कम से कम दो पिछले आम चुनावों के बराबर है।

दुःख की बात ये है कि कौन लोग, किसके प्रचार के लिए मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर कितने करोड़ ख़र्च कर रहे हैं इसका कोई हिसाब नहीं। मिसाल के तौर पर चुनाव घोषित होने के दो महीने पहले से ही दलों ने अख़बारों में पूरे पेज के इश्तिहार निकालने शुरू कर दिए। इसी से अंदाजा लगा लीजिए की एक विज्ञापन की क़ीमत 20 लाख रुपए तक हो सकती है। चुनाव सम्बन्धी शोध में पता चला कि महज़ 125 करोड़ रुपए तो सिर्फ़ ओपिनियन पोल कराने में ही ख़र्च कर दिए गए। कॉरपोरेट या बड़े व्यापार समूहों द्वारा चुनाव में ख़र्च किया जा रहा रुपया अब बेहिसाब होता जा रहा है। सभी के अपने मक़सद होते हैं, जैसे सीमेंट कम्पनियाँ किसी एक पार्टी को करती हैं और खनन कम्पनियाँ अपने क्षेत्रों में करती हैं। पिछले आम चुनाव में आचार संहिता लागू होने के पहले ही कॉरपोरेट जगत 1,000 करोड़ रुपए ख़र्च कर चुका था।

उड़नखटोलों में बैठकर चुनाव प्रचार के लिए जाना अब बेहद आम बात हो गयी है। 2014 में इन उड़नखटोलों पर जहां 400 करोड़ रुपया खर्च होने का अनुमान था वहीं 2019 में ये खर्च बढ़कर दो गुना हो गया। अब पीएम और सीएम ही नहीं सामान्य स्टार प्रचारक भी बिना उड़नखटोले के चुनाव प्रचार के लिए नहीं जाते। अभी वर्तमान में मध्यप्रदेश में 28 सीटों के लिए हो रहे उप चुनावों तक में उड़नखटोले स्कूटर की तरह इस्तेमाल किये जा रहे हैं।

आपको ये जानकर भी हैरानी होगी कि महंगे होते चुनावों के बावजूद भारत में चुनावों को लेकर राजनीतिक दलों की दिलचस्पी कम नहीं हुई है। इस समय देश में कुल 3,626 राजनीतिक पार्टिंयां हैं, इनमें केवल 1841 को ही केंचुआ ने मान्‍यता दी है। हर चुनाव में नए दल मैदान में होते हैं। लगातार महंगे होते चुनाव आम आदमी की पकड़ से बाहर निकल गए हैं। अब आदमी चुनाव लड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकता। ऐसे में वैकल्पिक राजनीति पर विचार किया जाना आवश्यक हो गया है। आशंका इस बात की है कि यदि इसी तरह चुनाव महंगे होते रहे तो लोकतंत्र पूंजीपतियों का ‘चेरा’ होकर रह जाएगा, क्योंकि जिसके पास पूँजी होगी वो ही चुनावों में किस्मत आजमा सकता है।

मेरा अपना अनुभव तो ये कहता है कि अब राजनीति भी निवेश का एक माध्यम बन गयी है, लोग पैसा देकर टिकिट खरीदते हैं, चुनाव में पैसा लगते हैं और चुनाव जीतने के बाद अपने पैसे को मय मुनाफे के वसूल भी करते हैं। भ्रष्‍टाचार इसी कारण पनपता है। चुनाव में कदाचार का आलम ये है कि पैसे के अलावा शराब, और सामान सबका इस्तेमाल हो रहा है। 2014 में चुनाव प्रचार के दौरान अधिकारियों ने 1.6 करोड़ लीटर शराब जब्त की थी। गरीबों को मतदान के लिए लुभाने के वास्ते शराब का इस्तेमाल होता है। अमेरिका में भी चुनावों में पैसा चलता है लेकिन भारत की तरह नहीं। वहां प्रत्याशियों के परिजनों पर विदेशों से रुपया लेने के आरोप लगते हैं।

राकेश अचल

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1 comments:

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